अब के बर्सो तो युं बरसो, हर चातक की प्यास बुझे.
चहेरेमें खिले गुल,गुलशन में, कोकिल की आवाझ गुंझे.
तेरे गम में, मैं हुं शामिल,मेरे सुख में आना तु भी.
अश्रु छलके तेरी आंखों से, मेरे दिल से आह ऊठे.
हर कुचे में, बेबस अबला, क्युं जलती है सोच जरा.
लालच के ईन पाषाणों में, अब तो थोडा, प्यार ऊगे.
चारा खाता, रबडी खाता, युरीया जिसने पचाया है.
ऐसा नेता तेरे दुःख की, क्युं कोई फरियाद सूने.
चेतन चाहे तुम चिल्लाओ,जैसे भी हो वह खुशी पाता.
चाहे हरसु अग्नी फैले, चाहे तेरा घर ही तूटे.
आपके किंमती अभिप्राय आवकार्य हैं!
चेतन फ्रेमवाला
Saturday, May 9, 2009
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