Sunday, April 3, 2011

प्यास

जाम खाली मिला; तिस्नगी पी गया.
था छलावा मगर झींदगी पी गया.

हर तरफ प्यास में था झुलसता झहां
और वो घूंट में एक नदी पी गया

रोज़ लडता रहा पेट कि आग से,
चोट हर एक समज आखरी पी गया.

रोशनी कि दुआ मांगता कोई ठा.
और कोई यहां चांदनी पी गया.

शक्लो सूरत नहीं दिल खरा चाहिए.
एक नझर झुक गई सादगी पी गया.

तू नहीं , मैं नहीं, श्वेत चादर हुई,
आंख दिलकी खुली, रोशनी पी गया.

चेतन फ्रेमवाला

2 comments:

Unknown said...

शक्लो सूरत नहीं दिल खरा चाहिए.
एक नझर झुक गई सादगी पी गया.

तू नहीं , मैं नहीं, श्वेत चादर हुई,
आंख दिलकी खुली, रोशनी पी गया

kya baat hai !!!!

વિવેક said...

સુંદર ગઝલ, ચેતનભાઈ...
ઘણા વખતે કંઈક નવું લઈ આવ્યા... અભિનંદન !!