Sunday, April 3, 2011

चाहत

बच्चों जैसी सादगी अब चाहता हुं.
बांटुं सब को ही खुशी अब चाहता हुं.

भीड़् में खुद से ही दूरी हो गई है.
मेरे यारों की गली अब चाहता हुं

तन्खा राशन; बीस को फिर झेब खाली !
थोडी बदले झिंदगी अब चाहता हुं.

मेरे सीने में रहा अंधेरा लेकिन,
तेरे घरको रोशनी अब चाहता हुं.

सो मरे, चेनल बदल दी, कॉफी पी ली.
मेरी आंखों में नमी अब चाहता हुं

इस नगर में जी गया तेरी ईनायत !
सैर्फ तेरी बंदगी अब चाहता हुं.

चेतन फ्रेमवाला

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