Sunday, April 3, 2011

प्यास

जाम खाली मिला; तिस्नगी पी गया.
था छलावा मगर झींदगी पी गया.

हर तरफ प्यास में था झुलसता झहां
और वो घूंट में एक नदी पी गया

रोज़ लडता रहा पेट कि आग से,
चोट हर एक समज आखरी पी गया.

रोशनी कि दुआ मांगता कोई ठा.
और कोई यहां चांदनी पी गया.

शक्लो सूरत नहीं दिल खरा चाहिए.
एक नझर झुक गई सादगी पी गया.

तू नहीं , मैं नहीं, श्वेत चादर हुई,
आंख दिलकी खुली, रोशनी पी गया.

चेतन फ्रेमवाला

चाहत

बच्चों जैसी सादगी अब चाहता हुं.
बांटुं सब को ही खुशी अब चाहता हुं.

भीड़् में खुद से ही दूरी हो गई है.
मेरे यारों की गली अब चाहता हुं

तन्खा राशन; बीस को फिर झेब खाली !
थोडी बदले झिंदगी अब चाहता हुं.

मेरे सीने में रहा अंधेरा लेकिन,
तेरे घरको रोशनी अब चाहता हुं.

सो मरे, चेनल बदल दी, कॉफी पी ली.
मेरी आंखों में नमी अब चाहता हुं

इस नगर में जी गया तेरी ईनायत !
सैर्फ तेरी बंदगी अब चाहता हुं.

चेतन फ्रेमवाला