Wednesday, December 31, 2008

ये तेरा ये मेरा क्यूँ है.
हर दिल में अँधेरा क्यूँ है,

शीशा टूटा - दिल ही टूटे,
नफ़रत का ये डेरा क्यूँ है

अपनी अपनी किश्मत सबकी,
रेखा ओं का घेरा क्यूँ है

मेरी आँखें थे अश्रु तेरे,
अब आखों पर पहेरा क्यूँ है.

जैसे भी हो खुल के आओ,
हर चहेरे पर चहेरा क्यूँ है.

दुश्मन भी अब मित हैं तेरे,
चेतन फिर तु ठहेरा क्यूँ है.

चेतन फ्रेमवाला.

Wednesday, December 17, 2008

एक ग़ज़ल

जीवन में युं अक्सर देखा.
हर झख्मों पर नस्तर देखा

घर से बाहर कैसे निकलें,
हर आंखों मे अजगर देखा.

आस्तिनों मे जाने क्या हो?
दोस्तों को भी डरकर देखा

रहेमत की दो बूंदें बरसीं
फिर हाथों में पत्थर देखा…

दिल को थोडी राहत पहोंची,
बच्चों ने जब हसकर देखा…

ढुंढा हरशुं, वो ना मिलता
गीता बायबल पढकर देखा...

कै टुकडॉ में बिखरा चेतन.
हर टुकडे में इश्वर देखा…..

आपके किंमती अभिप्राय आवकार्य हैं!
चेतन फ्रेमवाला

Thursday, June 12, 2008

एक तलाश

तलाश करता रहा मैं तूझे,दर-बदर, ईधर -उधर,
गोया,मैं जानता था, मौजुद है तु हर गुजर ...

था गांव में, तो कभी तूजे महेसूस भी कीया!
न जाने कहां खो दीया,जब से आया इस शहर,

सूना है, सांसें भी बक़्शी हैं गीन-गीन के मुझे,
जब देखा, हिसाबां-जींदगानी,तो बचा था सीफर.

बारुदी हवांएं, कुछ ईस तराह् छाई हैं, फीझाओं में,
लाख कोशिशे, पर राहे अमन आता नहीं नजर !

लम्हें-दर लम्हें, हो रहा है मोत से सामना,
ये तेरी ईनायत की हो गई ये जींदगी बसर .

अब सरोकारे जहां भी नहीं, मैं भी नहीं, तु भी नहीं,
आखीरकार चेतन ,बंदगी में आया वो असर ...

आपके अनमोल अभिप्राय आवश्यक हैं.

जय हिन्द,

चेतन फ्रेमवाला.