ये तेरा ये मेरा क्यूँ है.
हर दिल में अँधेरा क्यूँ है,
शीशा टूटा - दिल ही टूटे,
नफ़रत का ये डेरा क्यूँ है
अपनी अपनी किश्मत सबकी,
रेखा ओं का घेरा क्यूँ है
मेरी आँखें थे अश्रु तेरे,
अब आखों पर पहेरा क्यूँ है.
जैसे भी हो खुल के आओ,
हर चहेरे पर चहेरा क्यूँ है.
दुश्मन भी अब मित हैं तेरे,
चेतन फिर तु ठहेरा क्यूँ है.
चेतन फ्रेमवाला.
Wednesday, December 31, 2008
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1 comment:
इस तेरा और मेरा ने तो घर, परिवार और देश तक को टुकडों में बाँट कर रख दिया है...... प्रयास सराहनीय है... आभार...
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