Thursday, June 12, 2008

एक तलाश

तलाश करता रहा मैं तूझे,दर-बदर, ईधर -उधर,
गोया,मैं जानता था, मौजुद है तु हर गुजर ...

था गांव में, तो कभी तूजे महेसूस भी कीया!
न जाने कहां खो दीया,जब से आया इस शहर,

सूना है, सांसें भी बक़्शी हैं गीन-गीन के मुझे,
जब देखा, हिसाबां-जींदगानी,तो बचा था सीफर.

बारुदी हवांएं, कुछ ईस तराह् छाई हैं, फीझाओं में,
लाख कोशिशे, पर राहे अमन आता नहीं नजर !

लम्हें-दर लम्हें, हो रहा है मोत से सामना,
ये तेरी ईनायत की हो गई ये जींदगी बसर .

अब सरोकारे जहां भी नहीं, मैं भी नहीं, तु भी नहीं,
आखीरकार चेतन ,बंदगी में आया वो असर ...

आपके अनमोल अभिप्राय आवश्यक हैं.

जय हिन्द,

चेतन फ्रेमवाला.

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