ये तेरा ये मेरा क्यूँ है.
हर दिल में अँधेरा क्यूँ है,
शीशा टूटा - दिल ही टूटे,
नफ़रत का ये डेरा क्यूँ है
अपनी अपनी किश्मत सबकी,
रेखा ओं का घेरा क्यूँ है
मेरी आँखें थे अश्रु तेरे,
अब आखों पर पहेरा क्यूँ है.
जैसे भी हो खुल के आओ,
हर चहेरे पर चहेरा क्यूँ है.
दुश्मन भी अब मित हैं तेरे,
चेतन फिर तु ठहेरा क्यूँ है.
चेतन फ्रेमवाला.
Wednesday, December 31, 2008
Wednesday, December 17, 2008
एक ग़ज़ल
जीवन में युं अक्सर देखा.
हर झख्मों पर नस्तर देखा
घर से बाहर कैसे निकलें,
हर आंखों मे अजगर देखा.
आस्तिनों मे जाने क्या हो?
दोस्तों को भी डरकर देखा
रहेमत की दो बूंदें बरसीं
फिर हाथों में पत्थर देखा…
दिल को थोडी राहत पहोंची,
बच्चों ने जब हसकर देखा…
ढुंढा हरशुं, वो ना मिलता
गीता बायबल पढकर देखा...
कै टुकडॉ में बिखरा चेतन.
हर टुकडे में इश्वर देखा…..
आपके किंमती अभिप्राय आवकार्य हैं!
चेतन फ्रेमवाला
हर झख्मों पर नस्तर देखा
घर से बाहर कैसे निकलें,
हर आंखों मे अजगर देखा.
आस्तिनों मे जाने क्या हो?
दोस्तों को भी डरकर देखा
रहेमत की दो बूंदें बरसीं
फिर हाथों में पत्थर देखा…
दिल को थोडी राहत पहोंची,
बच्चों ने जब हसकर देखा…
ढुंढा हरशुं, वो ना मिलता
गीता बायबल पढकर देखा...
कै टुकडॉ में बिखरा चेतन.
हर टुकडे में इश्वर देखा…..
आपके किंमती अभिप्राय आवकार्य हैं!
चेतन फ्रेमवाला
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