तलाश करता रहा मैं तूझे,दर-बदर, ईधर -उधर,
गोया,मैं जानता था, मौजुद है तु हर गुजर ...
था गांव में, तो कभी तूजे महेसूस भी कीया!
न जाने कहां खो दीया,जब से आया इस शहर,
सूना है, सांसें भी बक़्शी हैं गीन-गीन के मुझे,
जब देखा, हिसाबां-जींदगानी,तो बचा था सीफर.
बारुदी हवांएं, कुछ ईस तराह् छाई हैं, फीझाओं में,
लाख कोशिशे, पर राहे अमन आता नहीं नजर !
लम्हें-दर लम्हें, हो रहा है मोत से सामना,
ये तेरी ईनायत की हो गई ये जींदगी बसर .
अब सरोकारे जहां भी नहीं, मैं भी नहीं, तु भी नहीं,
आखीरकार चेतन ,बंदगी में आया वो असर ...
आपके अनमोल अभिप्राय आवश्यक हैं.
जय हिन्द,
चेतन फ्रेमवाला.
Thursday, June 12, 2008
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